वैश्वीकरण एवं औद्योगिक विकास का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
डाॅ. सुबोध कुमार शुक्ला
अतिथि विद्वान (वाणिज्य) शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अमरपाटन जिला सतना (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
नई आर्थिक नीति का अर्थ केवल विदेशी व्यापार या विदेशी पूॅजी निवेश तक ही सीमित नहीं है। अर्थव्यवस्था के सभी अंगों में नियंत्रणों के स्थान पर उदारीकरण अपनाया जाये। नई आर्थिक नीति के प्रमुख अंग है-नई औद्योगिक नीति, राजकोषीय नीति, नई मौद्रिक नीति, विदेशी नीति, विनियम नियंत्रण नीति, नई व्यापार नीति आदि। वैश्वीकरण का सामान्य रूप से आशय पूरे विश्व का एक सत्ता के रूप में मानने से है, इसमें सभी आर्थिक बाधाओं को हटा दिया जाता है, जिससे कि बाजार शक्तियाॅ स्वतंत्र रूप से अपनी भूमिका अदा कर सकें। वास्तव में वैश्वीकरण व्यापारिक क्रियाकलापों का अन्तर्राष्ट्रीयकरण है जिसमें पूरे विश्व को एक ही क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार यह व्यापार को न्यूनतम लागत ळें इस प्रकार नवीन आर्थिक नीति देश में आर्थिक विकास में व्यापक प्रभाव डाली है। जैसे- प्रतिकूल वातावरण, सीमित वित्तीय साधन, राजनीतिक एवं प्रशासनिक समस्या, धीमी गति, अनुचित क्षेत्र का प्रवेश।
KEYWORDS: नाई आर्थिक नीति, वैश्वीकरण, औद्योगिक विकास, अर्थव्यवस्था।
प्रस्तावना:-
बढ़ते अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा विनियोग के माध्यम से विश्व अर्थव्यवस्था आज वैश्वीकरण की ओर अग्रसर हो रही है। कुछ अपवादों को छोड़कर विश्व व्यापार विश्व के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तेजी से एक-दूसरे पर निर्भर होती जा रही है। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि नब्बे के दशक व उससे आगे के समय में वैश्वीकरण जीवन का एक हिस्सा होगा।
वैश्वीकरण का सामान्य रूप से आशय पूरे आशय पूरे विश्व का एक सत्ता के रूप में मानने से है इसमें सभी आर्थिक बाधाओं को हटा दिया जाता है जिससे कि बाजार शक्तियाॅ स्वतंत्र रूप से अपनी भूमिका अदा कर सकें। इस प्रकार वैश्वीकरण शब्द से तात्पर्य विश्व एक बाजार के रूप मंे से होता है। वैश्वीकरण में विश्व के वित्तीय तथा तकनीकी संसाधनों का स्वतंत्र आवागमन होता है।
वास्तव में वैश्वीकरण व्यापारिक क्रियाकलापों का अन्तर्राष्ट्रीयकरण है जिसमें पूरे विश्व को एक ही क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार यह व्यापार को न्यूनतम लागत में दक्ष बनाकर उसे प्रतियोगी रूप देने का एक प्रयास है।
वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं से प्रतिबन्धित न रह कर विश्व बाजार में निहित तुलनात्मक लागत लाभ दशाओं का विदोहन करने के दिशा में अग्रसर होता है। जिसमें भारत में भी वैश्वीकरण कि प्रक्रिया धीरे-धीरे गति पकड़ रही है भारत मंे वैश्वीकरण कि प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई जब औद्योगिक नीति के अन्तर्गत अर्थव्यवस्था में खुलेपन के लिये उदारीकरण किया गया। जिसमें लाइसेंस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया विदेशी पूॅजी का विनियोग किया जाने लगा है। इसमें नये उद्योग स्थापित किये जाने लगे क्षेत्रीय असमानताओं को दूर किया गया। लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास किया गया है। विदेशी कम्पनियों को भारत में आने के लिए निमंत्रित किया जाने लगा। नये-नये रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए साथ ही तकनीक उन्नति को बढ़ावा देने कि आवश्यकता पर जो दिया जाने लगा।
इस लिये हम कह सकते है कि हमारी औद्योगिक अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण की दिशा में चल चुकी है परन्तु इस दिशा मे किये गये प्रयासों की सफलता में संदेह ही है इस समय न तो अंतर्राष्ट्रीय वातावरण उपयुक्त है और नहीं हमारी आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों इसके लिये तैयार है। देश में इस बात के लिये एकमत बनता जा रहा है। कि जिससे औद्योगिक आर्थिक नीति को अपना कर तथा भारतीय उत्पादकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता में सुधार किया जावे कृषि एवं लघु क्षेत्र का आधुनिक करण करके तथा कृषि क्षेत्र में शोध एवं विकास के विस्तार की गुणवत्ता का विकास किया जा सके। जिससे देश विकसित राष्ट्रो में शामिल हो सके।
अर्थात् भारत में घरेलू उदारीकरण कि प्रक्रियाएॅ साथ-साथ चलने से कुछ कठिनाईयाॅ आती है। लेकिन प्रयत्न करने पर हम आधुनिककरण मानवीय विकास एवं सामाजिक न्यासय में तालमेल बैठाते हुए अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धात्मक व अधिक कार्य कुशल बनाया जा सकता है। इस प्रकार से कहा जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिये हमें दोनों मोर्चो पर एक साथ कार्य करना होगा तभी औद्योगिक विकास किया जा सकता है।
वैश्वीकरण से आशय सम्पूर्ण विश्व का परस्पर सहयोग एंव समन्वय से एक बाजार के स्वरूप में कार्य करने से है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं के एक देश से दूसरे देश में आने एवं जाने के अवरोध का समाप्त कर दिया है। वैश्वीकरण के शिक्षित कुशल और सम्पन्न लोगों को सर्वाधिक लाभ हुआ है जबकि, समाज का कमजोर वर्ग एवं गरीब वर्ग वैश्वीकरण के लाभों से वंचित है। अर्थात् वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सभी व्यापारिक क्रियाओं का अन्तर्राष्ट्रीय हो जाता है और वे एक इकाई के रूप में करती है। जिसमें विश्व बाजार औद्योगिक विकास के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबंधित न रह कर विश्व व्यापार में निहित है। तुलनात्मक लागत लाभ दशाओं का विदोहन करने कि दशा में अग्रसर होता है। इस प्रकार से वैश्वीकरण की प्रक्रिया सन् 1991 में प्रारंभ हई थी तभी से औद्योगिक विकास नीति के अन्तर्गत अर्थव्यवस्था में खुलेपन के लिये उदारीकरण किया गया। इससे पहले हमारा औद्योगिक विकास का ढांचा बहुत कमजोर था और जो भी थोड़े बहुत उपभोग वस्तु उद्योग थे वे अनेक समस्याओं से जैसे पॅॅूजी की कमी औद्योगिक अशान्ति कच्चे माल की कमी से ग्रसित थे इस स्थिति में दिसम्बर 1947 में औद्योगिक वातावरण की अनिश्चितता को समाप्त करने के उद्देश्य से सरकार ने औद्योगिक सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में देश के लिये मिश्रित अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् अब तक 6 बार औद्योगिक विकास नीतियों की घोषणा की जा चुकी है। देश की प्रथम सरकार के दृष्टिकोण की प्रारंभिक रूप रेखा रखी गयी थी। इस प्रकार से सन् 1956 में इसमें संशोधन किया गया जिसमें औद्योगिक विकास के लिये सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख भूमिका को जो दिया गया। 1980 में औद्योगिक नीति से घरेलू बाजार में प्रतियोगिता को जोर दिया गया तथा इस देश में औद्योगिक विकास की गति और स्तर आवश्यकता के अनुरूप नहीं बढ़ पाया तथा उद्योगों के लाइसेंस व्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को समाप्त करने तथा उद्योगों के विकास एवं विश्व बाजार में इन्हें प्रतियोगिता बनाये रखने के लिये 1991 में औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी। इस नीति की घोषण 24 जुलाई 1991 में औद्योगिक नीति की पी.जे. कुरियन तथा राज्यसभा में श्री पी.के. थुंगन द्वारा की गयी थी।
औद्योगिक विकास नीति के उद्देश्य:-
1. लाइसेन्स व्यवस्था समाप्त करना:- औद्योगिक विकास का प्रमुख उद्देश्य 5 प्रमुख उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी के लिये लाइसेंस की व्यवस्था को समाप्त कर दी गयी थी चाहे वे कितनी ही पॅॅूजी की क्यों न लगाई जाये।
2. विदेशी सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना:- उत्पादन व निर्यात में वृद्धि के लिये विदेशी पॅूजी और विदेशी तकनीको को प्रोत्साहन दिया जाने लगा। विदेशी निवेश के प्रस्ताव के साथ ही विदेशों के प्रस्ताव के साथ ही विदेशी तकनीकी प्राप्त करने की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया।
3. अर्थव्यवस्था में खुलापन लाना:- औद्योगिक विकास एवं वैश्वीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलापन आया जो कि विकास के लिये आवश्यक था।
4. विदेशी व्यापार को बढ़ावा देना:- भारतीय अर्थव्यवस्था एवं औक्षेगिक विकास के लिये विदेशी व्यापार को बढ़ावा दिया जाने लगा।
5. पिछड़े क्षेत्र में औद्योगिक विकास करना:- औद्योगिक विकास नीति का प्रमुख उद्देश्य यह था कि वह पिछड़े क्षेत्र में औद्योगिक विकास करना तथा जिससे कि उन क्षेत्र के प्रति के साथ जोड़ लिया जा सके।
6. निजी क्षेत्र को कार्य करने की स्वतंत्रता:- निजी क्षेत्र की इकाईयों की ठीक से चलाने के लिये उन्हें औद्योगिक और वित्त पुनर्निर्माण के लिये कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी जिससे वे नये उद्योग को स्थापित कर सके।
7. आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था का विकास करना:- औद्योगिक विकास का प्रमुख उद्देश्य यह था कि वह आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था का विकास करके नये-नये उद्योग को स्थापित किया जाना चाहिए ताकि सही विकास हो सके।
8. निर्यात बढ़ाने के लिये आयातों को उदार बनाना:- वैश्वीकरण एवं औद्योगिकीकरण विकास-नीति के अंतर्गत बढ़ाने के लिये आयातों को और अधिक सरल बना दिया गया है जिससे कि कच्चे माल का आयात निर्यात आसानी से किया जा सके। साथ ही उत्पादन क्षमता को अधिक बढ़ावा दिया जाने लगा है।
9. विद्यमान पंजीकरण योजना समाप्त करना:- औद्योगिक विकास नीति व इकाईयो के पंजीकरण के संबंध में विद्यमान सभी योजनाओं को समाप्त कर दिया गया। जब उद्यमियों को नरयी परियोजनाओं तथा पर्याप्त विस्तार कार्यक्रम के संबंध में एक सूचना ज्ञापन को जमा करना होगा।
औद्योगिक विकास के महत्व:-
औद्योगिक विकास के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के महत्व को प्रदर्शित किया गया है जो कि विकासशील राष्ट्र के लिए आवश्यकता है।
उत्पादन में वृद्धि:-
वैश्वीकरण एवं औद्योगिक विकास विदेशी विनियोग तथा पूॅजी तकनीकी समझौता गुण तकनीक विपणन, विदेशी पूॅजी तथा प्रबंधकीय कुशलता को आकर्षित करना है।
प्रतियोगिता में वृद्धि करना:-
पूॅजीवादी अर्थ प्रणाली की संख्या प्रतियोगिता होती है एकाधिकार प्रतिबंधात्मक एवं उचित व्यापार के नियंत्रण तथा उत्पादन विपणन की नयी आर्थिक विकास तथा घरेलू कम्पनी भी विदेशी कम्पनियों से अपने आप को बचाने का प्रयास करती है।
सार्वजनिक क्षेत्रों का विकास:-
भारत एक समाजवादी समाज की स्थापना करने एवं निजी क्षेत्र में आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण को रोकने की दृष्टि से सार्वजनिक क्षेत्रों का विस्तार किया। आधारभूत उद्योगों का विकास वैश्वीकरण एवं नयी औद्योगिक विकास नीति के कारण हो सका। तकनीकी एवं प्रबंधकीय शिक्षा का विस्तार करना औद्योगिक संरचना का विस्तार करना वैश्वीकरण को प्रोत्साहित करने के कारण नयी तकनीको का प्रयोग हो सका विदेशी सहयोग से स्थापित उपक्रमों में वृद्धि औद्योगिक प्रगति की स्थिति का महत्वपूर्ण विकास होता है जो विदेशी तकनीकों के सहारे से नये उपक्रमों को स्थापित किया गया।
उद्योगों का विकेन्द्रीकरण की नीति:-
आर्थिकग नियोजन काल नीति में सरकार की यह नीति रही है कि उद्योगों का विकेन्द्रीकरण न हो और नये उद्योग स्थापित किया जा सके और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग की स्थापना में इस बात पर काफी ध्यान दिया गया है। भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर के इस्पात के कारखाने राॅची का भारी मशीनी कारखाना भोपाल का भारी बिजली का समान बनाने के कारखाने स्थापित किये गये। औद्योगिक सहकारिता का विकास आयात प्रतिस्थापना उद्योगों का विकास और आत्मनिर्भरता आर्थिक नियोजन में देश की औद्य़ोगिक संरचना एवं औद्योगिक विकास में निरंतर आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।
औद्योगिक विकास की वर्तमान स्थिति -
वर्तमान औद्योगिक विकास नीति जुलाई 1991 से लागू इसका प्रतिपादन दो चरण में किया गया एक तो 24 जुलाई 1991 को जिसका संबंध बड़े व मध्यम उद्योगों से है इसका 6 अगस्त1991 को जो लघु उद्योगों से संबंधित है। यह नीति रूप से विदेशी सहयोग बढ़ाने अर्थव्यवस्था को अनावश्यक नियंत्रण के साथ परिवर्तन आदि पर विशेष बल दिया गया तथा निजी क्षेत्र को काफी सीमा तक उन्मुक्त होकर कार्य करने का अवसर और अपने आप को प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना है। इसके उद्देश्य आर्थिक व्यवस्था में खुलापन करना, विदेशी सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक विकास करना निजी क्षेत्रों में कार्य करने के लिये स्वतंत्रता प्रदान करना आधुनिक प्रतिस्पर्धा अर्थव्यवस्था का विकास करना तथा उत्पादन क्षमता का विस्तार करना आदि प्रमुख उद्देश्य है।
भारत में तीन प्रकार के औद्योगिक क्षेत्र हैं जिनका मापन पंूजी एवं उत्पादन क्षमता के आधार पर किया जाता है। बृहत उद्योग, मध्यम उद्योग तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास नई औद्योगिक नीति के पश्चात काफी बढ़ा है। बड़ो उद्योगों के लिये पूंजीगत सामान आयात करने की सुविधा कच्चे माल की सहज उपलब्धता एवं बिक्री आदि की व्यवस्था किये जाने के कारण बड़े-बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में प्रवेश किये हैं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश भी इन्हीं बड़े उद्योगों के लिये किया गया है। मध्यम दर्जे के उद्योग भी शसन के सहयोग एवं बैंकों की ऋण सुविधाएं आदि के कारण विकास हुआ है। लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिये अनेक स्तरों पर बढ़ावा दिया गया है। इस उद्योग से सुदूर गांवों के आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोग शताब्दियों से इन उद्योगों में लगे हैं। जिनकी पंूजी क्षमता कम एवं उत्पादन का क्षेत्र सीमित होने के कारण यद्यपि अधिक विकास नहीं हुआ किन्तु जीवनोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन हेतु लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास आवश्यक हो गया, क्योंकि निर्यात का 36 प्रतिशत भाग लघु एवं कुटीर उद्योगों के उत्पादों से होता है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है तथा विदेशी मुद्रा डाॅलर भारत में पर्याप्त रूप से आने लगा है।
नीचे दी गई सारणी में 8 प्रमुख उद्योगों का विकास बताया गया है
|
{ks= |
Hkkj |
2012&13 |
2013&14 |
2014&15 |
2015&16 |
2016&17 |
2017&18 |
|
dks;yk |
4379 |
-0.2 |
1.3 |
4.6 |
1.3 |
8.5 |
7.3 |
|
dPpk rsy |
5216 |
11.9 |
1.0 |
-0.6 |
-0.2 |
-0.9 |
-0.9 |
|
izkd`frd xSl |
1708 |
10.0 |
8.9 |
14.5 |
13.0 |
5.2 |
4.2 |
|
fjQkbujh mRikn |
5939 |
3.0 |
3.1 |
29.5 |
1.5 |
0.3 |
4.2 |
|
moZjd |
1254 |
0.0 |
0.4 |
-3.4 |
1.5 |
-0.1 |
2.4 |
|
yksgk |
6684 |
13.2 |
10.3 |
4.1 |
11.5 |
1.9 |
2.8 |
|
lhesUV |
2406 |
4.5 |
6.7 |
7.7 |
3.1 |
5.6 |
0.9 |
|
fo|qr |
10316 |
5.6 |
8.1 |
4.0 |
6.0 |
8.1 |
1.5 |
|
ldy lwpdkad |
37903 |
6.6 |
5.0 |
6.5 |
4.2 |
3.8 |
2.4 |
lzksr & vkfFkZd lykgdkj DIPP
उपरोक्त सारणी से प्रकट होता है कि कोयला उत्पादन में क्रमशः वृद्धि हुई एवं 2016-17 में यह सर्वाधिक थी। इसके अतिरिक्त प्रायः प्रमुख उद्योगों का उत्पादन प्रतिशत कम होता गया है।
अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:-
ऽ प्रतिकूल वातावरण: भारत ने जिस समय विश्वीकरण का निर्णय लिया उस समय अन्तर्राष्टीय वातावरण बहुत अनुकूल नही कहा जा सकता है। अमेरिका ने भारत पर ‘स्पेशल 301’ की धारा लागू करने की धमकी दे रखी है। वह भारत पर बौद्धिक संपदा, अधिकार संबंधी अवधारणा को स्वीकार करने के लिए दबाव डाल रहा है। यदि इसे स्वीकार किया जाता है तो हमारी बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के हाँथों में चली जायेगी ।
ऽ सीमित वित्तीय साधन: अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तु प्रतियोगिता कर सके इसके लिये वस्तु की किस्म सुधार व उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में पूंजी की अवाश्यकता होगी। सभी विकासशील देशों की पूँजी आवश्यकता को कोई भी विकसित पूँजीवादी देश पूरा करने में सक्षम नही है। परिणामस्वरूप इन देशों को विश्व बैंक व मुद्रा कोष के पास जाना पड़ेगा और यह संस्थाएँ इन देशों को अनुचित शर्ते मानने के लिये बाध्य करेंगी।
ऽ राजनीतिक एवं प्रशासनिक समस्या: भारत में कृषि, विद्यृत तथा आधारभूत सामाजिक सेवाओं के विकास का उत्तरदायित्व राज्य सरकारों पर है और यह सरकारें राजनीतिक अस्थिरता की समस्या से ग्रसित है, अतः इन सेवाओं का विकास उचित गति से नही हो पा रहा है। इसके अतिरिक्त, यहाँ राजनीतिक व प्रशासन मे बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार व्याप्त है, ऐसे मे विश्वीकरण की नीति की सफलता पर एक प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
ऽ धीमी गति: जिन देशों ने विश्वीकरण को अपनाया उन्होने उससे पूर्व अपने यहाँ इसके लिये वातावरण तैयार किया। हमने विश्वीकरण हेतु अपनी दिशा तो परिवर्तित कर ली परन्तु स्वतंत्र बाजार की दिशा में गति बहुत धीमी रखी है। संरचनात्मक सुधार अर्थव्यवस्था में उचित व पूर्ण रूप से नही हो सकें है।
ऽ अनुचित क्षेत्र में प्रवेश: विश्वीकरण की नीति के तहत उठाये गये उदारीकरण कदमों से बहुराष्ट्रीय कम्पानियों ने हमारे देश में रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया है।वह उपभोक्ता क्षेत्र के साथ-साथ सेवा क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहती है जो हमारे देश के लिये उचित नही है। इन कम्पनियों को केवल आधारित संरचना क्षेत्र में प्रवेश की ही अनुमति दी जानी चाहिए जिसमे कि ऊँची तकनीकि की आवश्यकता होती है।
औद्योगिक विकास की समस्यायें:- औद्योगिक विकास एवं वैश्वीकरण की महत्व के साथ अनेक समस्या भी है जो कि प्रमुख है असमान प्रतिस्पर्धा वैश्वीकरण ने असमान प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जो कि भारतीय उद्योगो के लिये पूँजी लागत बहुराष्ट्रीय निगमो की तुलना में बहुत अधिक है भारतीय उद्यमी अभी भी पहले के नियमों से जकड़े हुये है क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि औद्योगिक नीति के कारण आर्थिक क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि औद्योगिक नीति के कारण आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण होना सार्वजानिक क्षेत्रों के महत्व में भी सामाजिक उद्देश्यों की अवहेलना किया विनियोग की सीमा 51 में दूरी पूँजीगत माल आयात की सीमा विकास नीति अस्पष्ट विदेशी अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा के लिये खोलने का अर्थ है अधिक सस्ते आयात अधिक विदेशी निवेश बहुराष्ट्रीयक निगमो को देश में प्रवेश करने तथा घरेलू उद्योगो को हथियाने की स्वतंत्रता प्रमुख समस्या है।
भारतीय औद्योगिक के संदर्भ में वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज विकास करना भारतीय उत्पादको की प्रतिस्पर्धा क्षमता में सुधार किये गये है। उत्पादन में तीव्र विकास करना भारतीय कम्पनियों की संगठनात्मक की पुर्नसंरचना तकनीकी आत्मनिर्भर भारतीय तकनीको का विकास करना पेशेवर बनाना गैर निवासी भारतीय को निवेश करने में छूट देना पूँजी की स्वदेश वापसी की सीमा में वृद्धि करना, नये रोजगार के अवसर उत्पन्न करना विदेशी कम्पनियों को भारत में निवेश करने के लिये प्रोत्साहित करना जिससे कि औद्योगिक प्रतिस्थापना का विकास करना प्रतिस्थापना उद्योगों में विकास तथा उसे आत्मनिर्भरता बनाना साथ ही वित्तीय संस्थाओं की व्यवस्था करना आदि।
निष्कर्ष:-
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है, कि औद्योगिक विकास यद्यपि हमारी अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण कि दिशा में चल चुकी है। परन्तु उस दिशा में किये गये प्रयासों की सफलता में संदेह ही है इस समय न तो अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण ही उपयुक्त है और न ही हमारी आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों की इसके लिये तैयार है। भारत में घरेलू उदारीकरण की परिक्रियायें साथ-साथ चलने से कुछ कठिनाई आने लगी है लेकिन प्रयत्न करने पर हम आधुनिकीकरण एवं बना सकते है। अन्य देशों में पहले घरेलू उदारीकरण को सुदृढ़ किया गया और अपनी अर्थव्यवस्था को सबल व सक्षम बनाया इसी प्रकार से हम भी अपने देश को बाहरी उदारीकरण से देश से विश्व की प्रतियोगिता से आगे बढ़ाने के लिये एक साथ दोनो मोर्चो पर कार्य करना होगा।
सुझाव:-
दीर्घकालीन कर ढँाचाः हमारे यहाँ कर की दरों में प्रत्येक वर्ष परिवर्तन होते है। हमे नही मालूम होता है कि अगले वर्ष कर की दरों में क्या परिवर्तन होगें । ऐसे वातावरण में विनियोग निर्णय में कठिनाई आती है। अतः अन्य देशों की भाँति हमें दीर्घकालीन कर नीति बनानी चाहिये।
ऽ कम कीमत व अच्छी किस्म के आगतः हम प्रतियोगिता में इसलिए भी पिछड़ जाते है क्योंकि हमारे यहाँ आगतों की कीमतें ऊँची है व उनकी किस्म खराब है। हमारे यहाँ कुशल श्रमशक्ति है, सभी प्रकार के कच्चे साधन मौजूद हैं, विस्तृत बाजार है तथा निर्यात की सम्भावनाएँ मौजूद है, अतः यदि पड़ोसी देशों को जिन कीमत पर आगत प्दचनजेद्ध प्राप्त हो रहे हैं, उसी कीमत पर हमारे यहाँ भी उपलब्ध हो जायें जो हम अपनी अर्थव्यवस्था का आसानी से विश्वीकरण कर लेगें।
ऽ उद्यमों का अनुकूलतम आकार: जो उद्योग संसाधन आधारित होते हे जैसे स्टील, सीमेन्ट, आॅटोमोबाइल तथा विद्युत आदि उनका एक न्यूनतम आर्थिक आकार होना चाहिए। इससे वह न्यूनतम लागत पर उत्पादन करने में सक्षम हो जायेगी।
ऽ वित्तीय क्षेत्र में सुधार: वैश्वीकरण हेतु संरचनात्मक सुधार किये जा रहे है परन्तु वास्तविक अर्थ में संरचनात्मक सुधार तब तक पूरे नही कहे जा सकते जब तक कि साथ-साथ वित्तीय क्षेत्र में भी सुधार न किये जायें। वित्तीय उदारीकरण में साख उपयोग व ब्याज दरों पर लगे नियंत्रणो को हटाना आवश्यकता है।
मधुर औद्योगिक संबंध:
देश में मधुर औद्योगिक संबंध होने पर ही विदेशी विनियोग हमारे यहाँ आकर्षित होगा। इसके लिये सरकार को श्रमशक्ति के विवेकीकरण की स्पष्ट नीति बनानी चाहिये।
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Received on 05.10.2020 Modified on 24.10.2020
Accepted on 18.11.2020 © A&V Publications All right reserved
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